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3.4 अरब लोग आज भी ‘ऑफलाइन’! दुनिया की 40% आबादी तक इंटरनेट न पहुँचने से ग्लोबल इकोनॉमी को लगा खरबों का झटका; देखें रिपोर्ट

दुनिया की 40% आबादी ऑफलाइन क्यों? खरबों का नुकसान हो रहा अर्थव्यवस्था को। रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े, जानिए क्या है असली वजह और समाधान।

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दुनिया की चालीस प्रतिशत आबादी आज भी इंटरनेट की रोशनी से महरूम है। लगभग साढ़े तीन अरब से अधिक लोग ऐसी स्थिति में जी रहे हैं जहां नेटवर्क का सिग्नल या तो पहुंच ही नहीं पाता या फिर पहुंचने के बावजूद इस्तेमाल की तमाम बाधाएं उन्हें रोक लेती हैं। यह डिजिटल खाई न केवल व्यक्तिगत अवसरों को छीन रही है बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस विभाजन को पाटा जाए तो आर्थिक विकास की नई ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैं।

3.4 अरब लोग आज भी 'ऑफलाइन'! दुनिया की 40% आबादी तक इंटरनेट न पहुँचने से ग्लोबल इकोनॉमी को लगा खरबों का झटका; देखें रिपोर्ट

विभाजन के दोहरे चेहरे

इस समस्या को दो मुख्य हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा कवरेज की कमी का है जहां दूरदराज के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क का जाल ही बिछा नहीं पाया है। दूसरा और ज्यादा गंभीर यूजेज गैप है जहां सिग्नल उपलब्ध होने पर भी लोग स्मार्टफोन की ऊंची कीमत डेटा पैक महंगे होने डिजिटल जानकारी के अभाव या स्थानीय भाषा में सामग्री न मिलने से इससे दूर रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या और गहरी हो जाती है। खासकर महिलाओं की स्थिति चिंतनीय है क्योंकि वे पुरुषों की तुलना में काफी पीछे हैं। नतीजा यह है कि शिक्षा स्वास्थ्य व्यापार और मनोरंजन जैसे क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।

भारत का दर्दनाक आंकड़ा

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में यह संकट सबसे विकराल रूप ले चुका है। करोड़ों लोग यहां अभी भी डिजिटल दुनिया से कटे हुए हैं। ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे का अभाव और शहरी क्षेत्रों में भी आर्थिक बाधाएं इसे बढ़ावा दे रही हैं। दक्षिण एशिया में कुल प्रभावित आबादी इससे भी कहीं ज्यादा है। अफ्रीका जैसे महाद्वीपों में तो यह विभाजन आर्थिक पिछड़ापन का मुख्य कारण बन चुका है। चीन जैसे देशों में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। कुल मिलाकर विकासशील दुनिया इसकी चपेट में ज्यादा फंसी हुई दिखती है।

आर्थिक तबाही का पैमाना

इंटरनेट की कमी से उत्पादकता घटी हुई है। किसान अपनी फसल का सही दाम नहीं जान पाते छोटे व्यापारी वैश्विक बाजार तक नहीं पहुंच पाते और युवा शिक्षा के नए अवसरों से वंचित रह जाते हैं। महिलाओं के लिए तो यह दोहरी मार है क्योंकि मोबाइल बैंकिंग गिग काम और ऑनलाइन सीखने जैसे रास्ते बंद हो जाते हैं। अनुमान है कि इस गैप को भरने मात्र से सकल घरेलू उत्पाद में भारी उछाल आ सकता है। मोबाइल अर्थव्यवस्था पहले से ही अरबों डॉलर का योगदान दे रही है लेकिन बाकी आबादी को जोड़ने से यह कई गुना बढ़ सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नए तकनीकी दौर में यह पिछड़ापन और घातक साबित हो सकता है।

समाधान की राह में चुनौतियां

इस समस्या से निपटने के लिए किफायती उपकरणों की जरूरत है। डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम चलाने होंगे स्थानीय भाषाओं में सामग्री तैयार करनी होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क बढ़ाना होगा। बड़ी तकनीकी कंपनियों को जिम्मेदारी निभानी चाहिए ताकि ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे सेवाओं से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा बुनियादी ढांचे पर लगे। सरकारें सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा दें। भारत जैसे देशों में डिजिटल यात्रा तेज है लेकिन समावेशी विकास के बिना यह अधूरी रहेगी। विशेषज्ञ चेताते हैं कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दशकों में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना तय है।

उम्मीद की किरण

फिर भी आशा की किरणें दिख रही हैं। मोबाइल इंटरनेट अपनाने की दर बढ़ रही है और इनोवेशन नई संभावनाएं खोल रहा है। जरूरी है कि सभी हितधारक एकजुट हों। डिजिटल समावेशन केवल तकनीकी मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। अगर दुनिया इस दिशा में आगे बढ़ी तो नई विकास कहानी लिखी जा सकती है जहां कोई पीछे न छूटे। 

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