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महंगे गैस सिलेंडर से मिलेगी मुक्ति! भारत का अपना ‘देसी फ्यूल’ तैयार; कम खर्च में जलेगा चूल्हा, देखें सप्लाई अपडेट

महंगे गैस सिलेंडरों से जल्द राहत! भारत का देसी ईंधन DME तैयार, जो चूल्हे में कम खर्च पर चलेगा। स्वदेशी तकनीक से बना, सस्ता और साफ। पायलट टेस्ट सफल, जल्द बाजार में आएगा।

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पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण हालात ने भारत में रसोई गास की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई शहरों में सिलेंडरों की भारी किल्लत देखने को मिल रही है, जबकि दाम 1200 रुपये के पार पहुंच चुके हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक स्वदेशी ईंधन का विकल्प तैयार किया है, जो मौजूदा चूल्हों में ही कम खर्च पर काम करेगा। यह नया विकल्प देश की ऊर्जा निर्भरता को कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

महंगे गैस सिलेंडर से मिलेगी मुक्ति! भारत का अपना 'देसी फ्यूल' तैयार; कम खर्च में जलेगा चूल्हा, देखें सप्लाई अपडेट

नया ईंधन क्या है?

यह नया ईंधन डाइमिथाइल ईथर नामक सिंथेटिक गैस है। यह रसोई गैस की तरह ही दिखता और काम करता है, लेकिन बिना सल्फर के और पर्यावरण के लिए कम नुकसानदेह। पुणे की एक प्रमुख रिसर्च लैब ने इसे स्थानीय संसाधनों जैसे मेथनॉल से विकसित किया है। मुख्य खासियत यह है कि इसे मौजूदा गैस में 20 से 30 प्रतिशत तक मिलाया जा सकता है। इससे सिलेंडर, पाइप या चूल्हा बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जलने पर यह कम धुआं और प्रदूषण पैदा करता है, जो शहरों की हवा को साफ रखने में मददगार होगा।

सस्ते दाम का वादा

लागत की बात करें तो यह नया ईंधन पारंपरिक गैस से 30 से 50 प्रतिशत सस्ता पड़ सकता है। कारण साफ है। देश को अभी ज्यादातर रसोई गैस आयात करनी पड़ती है, जो विदेशी बाजारों के हवाले से महंगी हो जाती है। नया ईंधन घरेलू उत्पादन पर आधारित होगा, जिससे आयात बिल अरबों रुपये घटेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने के बाद आम घरों को सीधी राहत मिलेगी। खासकर उज्ज्वला योजना के करोड़ों लाभार्थी इसका फायदा उठा सकेंगे।

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सप्लाई की ताजा स्थिति

पायलट स्तर पर परीक्षण सफल हो चुके हैं। जल्द ही बड़े प्लांट लगाने की योजना है। तेल कंपनियों के साथ साझेदारी से शुरुआत में महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में उपलब्धता बढ़ेगी। नियामक संस्थाओं से मंजूरी मिलते ही राष्ट्रीय स्तर पर वितरण शुरू हो सकता है। सरकार इसे सब्सिडी देकर और सुलभ बनाने पर विचार कर रही है। हालांकि पूर्ण रूप से इसे अपनाने में कुछ समय लगेगा, क्योंकि भंडारण और सुरक्षा मानकों को मजबूत करना जरूरी है।

चुनौतियां और भविष्य

ग्रामीण इलाकों में अभी भी गैस ही प्राथमिक ईंधन है। बिजली वाले चूल्हों का विकल्प सीमित है। नया ईंधन आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम है। अगर समय पर अमल हुआ तो लाखों परिवार सस्ते में गर्म भोजन पा सकेंगे। आने वाले महीनों में इसकी असली ताकत साफ हो जाएगी। फिलहाल संकट से जूझ रही जनता को यह उम्मीद की किरण दे रहा है।

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