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बैंक में जमा ‘अपनों के पैसे’ पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! RBI से पूछा—वारिसों को क्यों नहीं देते जानकारी?

बैंकों में मृत लोगों के अरबों रुपये पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-RBI से पूछा, निष्क्रिय खाते की जानकारी वारिसों को क्यों न दी जाए। लाखों परिवारों का हक बचाने को नई नीति बनेगी।

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देशभर के बैंकों में मृत व्यक्तियों के नाम जमा अरबों रुपये बिना दावेदार के पड़े सड़ रहे हैं। इन धनराशियों को कानूनी उत्तराधिकारियों तक पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हालिया सुनवाई में कहा कि निष्क्रिय खातों का विवरण वारिसों को उपलब्ध कराने में आखिर क्या बाधा है।

बैंक में जमा 'अपनों के पैसे' पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! RBI से पूछा—वारिसों को क्यों नहीं देते जानकारी?

कोर्ट की केंद्रीय चिंता

पीठ ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि बैंकों में निष्क्रिय खातों की संख्या और उनमें जमा राशि तेजी से बढ़ रही है। लाखों परिवार अनजाने में अपने हक के धन से महरूम रह जाते हैं, क्योंकि बैंक स्वत: सूचना देने से कतरा रहे हैं। कोर्ट ने गोपनीयता का हवाला देकर पूरी रकम को अटकाए रखने पर सवाल खड़े किए। क्या धोखाधड़ी की आशंका के नाम पर न्यायोचित हक को नजरअंदाज किया जा सकता है। अगली सुनवाई से पहले केंद्र और आरबीआई को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

समस्या का विस्तार

रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि अनक्लेम्ड डिपॉजिट्स 35,000 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी हैं। पेंशनभोगी, वरिष्ठ नागरिकों या सामान्य खाताधारकों की मृत्यु के बाद उनके खाते निष्क्रिय हो जाते हैं। परिवार को पता ही नहीं चलता, क्योंकि कोई स्वचालित प्रक्रिया नहीं है। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और गंभीर है, जहां जागरूकता की कमी है। बैंकों को मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर तुरंत नोटिस भेजना चाहिए, ताकि दावा आसान हो।

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याचिका का आधार

यह जनहित याचिका उन असंख्य मामलों से उपजी है, जहां परिजन वर्षों तक खातों का सुराग नहीं ढूंढ पाते। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधार लिंकिंग के जरिए प्रक्रिया सरल बनाई जाए। सरकार के पुनरावलोकन अभियान को मजबूत करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मुद्दों पर दिशानिर्देश दिए, लेकिन जमीन पर अमल कमजोर रहा।

भविष्य की संभावनाएं

इस हस्तक्षेप से बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता का नया दौर शुरू हो सकता है। वारिस आसानी से दावा कर सकेंगे, जिससे बैंकों का अनुपयोगी धन सामाजिक हित में लगेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राइवेसी चिंताओं को संतुलित करते हुए नई गाइडलाइंस जरूरी हैं। आरबीआई को स्पष्ट नियम बनाकर बैंकों पर अमल सुनिश्चित करना होगा। यह कदम वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देगा, खासकर कमजोर वर्गों के लिए। न्यायपालिका की यह सक्रियता आमजन के हक की रक्षा का प्रतीक बनेगी।

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