
देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने महिलाओं के पक्ष में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बहुओं के ‘साझा घर’ में रहने के अधिकार को मजबूती प्रदान की है, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा का सामना कर रही किसी भी महिला को उसके ससुराल के घर से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता, चाहे उस संपत्ति पर उसके पति का मालिकाना हक हो या न हो।
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पुराना फैसला पलटा, बहुओं को मिली बड़ी राहत
जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले के माध्यम से 2006 के ‘एस.आर. बत्रा बनाम तरुणा बत्रा’ मामले के पुराने फैसले को पलट दिया है, पुराने फैसले के तहत बहुएं केवल अपने पति की स्व-अर्जित संपत्ति पर ही अधिकार का दावा कर सकती थीं, लेकिन अब नए आदेश के बाद वे ससुराल के पैतृक घर में भी रहने की कानूनी हकदार होंगी।
‘साझा घर’ की परिभाषा का विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने ‘साझा घर’ (Shared Household) की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें न केवल पति की संपत्ति, बल्कि सास-ससुर के स्वामित्व वाली या उनके द्वारा किराए पर ली गई संपत्ति भी शामिल है, अगर महिला शादी के बाद उस घर में रही है, तो वह घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत वहां रहने के अधिकार की मांग कर सकती है।
कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं किया जा सकता बेदखल
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी पीड़ित महिला को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना घर से बाहर नहीं निकाला जा सकता, यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा जो वैवाहिक विवादों के दौरान घर से निकाल दिए जाने के डर में जीती थीं।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय समाज में महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान को सुनिश्चित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है, अब ससुराल पक्ष केवल संपत्ति का हवाला देकर बहू को घर छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकेगा।
















