ब्रिटिश शासन के दौर में भारतीय व्यापारियों की आर्थिक ताकत की एक अनसुनी दास्तान सीहोर से सामने आ रही है। यहां के प्रसिद्ध सेठ जुम्मालाल रूठिया ने 109 वर्ष पूर्व भोपाल रियासत के प्रबंधन के लिए अंग्रेजी हुकूमत को 35 हजार रुपये उधार दिए थे। वह दौर था जब यह रकम किसी छोटे राज्य के सालाना खर्च के बराबर थी। सेठ के निधन के बाद यह कर्ज लौटाया नहीं गया। अब उनके पोते विवेक रूठिया पुराने कागजातों के सहारे ब्रिटिश सरकार से ब्याज सहित करोड़ों रुपये वापस मांगने की तैयारी में हैं।

यह घटना न सिर्फ एक परिवार की विरासत को दर्शाती है, बल्कि औपनिवेशिक काल में देसी पूंजी की भूमिका को भी रेखांकित करती है। विवेक रूठिया के अनुसार, दादा की वसीयत और ब्रिटिशकालीन अभिलेखों में यह सौदा दर्ज मिला। 1937 में सेठ जुम्मालाल के स्वर्गवास के बाद कोई किस्त नहीं चुकाई गई। समय के साथ चक्रवृद्धि ब्याज जोड़ने पर यह राशि अब कई करोड़ तक पहुंच चुकी है। विवेक का इरादा साफ है कि वे वैश्विक कानूनी प्रावधानों का हवाला देकर अपना हक हासिल करेंगे।
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परिवार की भव्य विरासत
रूठिया खानदान आजादी से पहले सीहोर का सबसे संपन्न घर था, जो स्थानीय नवाबी खानदानों के बाद दूसरे क्रम पर आता था। सेठ जुम्मालाल न केवल व्यापार में माहिर थे, बल्कि ब्रिटिश अफसरों के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। उनकी संपत्ति भोपाल से इंदौर तक फैली हुई थी। सीहोर शहर का बड़ा हिस्सा उनकी जमीनों पर आज भी खड़ा है, जिसमें पुरानी हवेलियां और व्यस्त बाजार शामिल हैं। वर्तमान में परिवार खेतीबाड़ी, सराय चलाने और जमीन के कारोबार से जुड़ा हुआ है। हालांकि कई पुरानी संपत्तियों पर गैरकानूनी कब्जे और बेहद कम मासिक किराया वसूली को लेकर अदालती मामले लंबित हैं।
सेठ को कुबेर की उपाधि इसलिए मिली क्योंकि वे धनवान होने के साथ जरूरतमंदों के उपकारक थे। भोपाल रियासत के आर्थिक संकट में उन्होंने यह कर्ज बिना हिचक दिया, जो प्रशासनिक जरूरतों पर खर्च हुआ। लिखित करार में ब्याज दरें तय थीं, जो अब वसूली का आधार बने हैं।
कानूनी जंग का अनुमान
विवेक का तर्क है कि ब्रिटिश ताजपुरोहित पुराने वित्तीय बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता। वे लीगल सूचना पत्र भेजकर प्रक्रिया शुरू करेंगे। मगर कानून के जानकारों का आकलन है कि इतने लंबे समय के बाद समय सीमा की बाधा आ सकती है। ब्रिटेन की अदालतें ऐसी प्राचीन देनदारियों पर शायद विचार ही न करें। फिर भी यह खबर सोशल मीडिया पर जोरदार तरीके से फैल चुकी है, जिससे रूठिया परिवार को नई पहचान मिल रही है।
औपनिवेशिक कर्जों की यादें
यह पहला उदाहरण नहीं जब ब्रिटिश काल के पुराने उधार चर्चा में हैं। बंगाल के जगत सेठ जैसे कारोबारियों ने मुगलों और अंग्रेजों को आर्थिक सहारा दिया था। भारत आज भी कोहिनूर जैसे ऐतिहासिक धरोहरों पर दावा ठोंक रहा है। सीहोर का यह किस्सा वैश्विक बहस को हवा दे सकता है। स्थानीय लोग इसे गौरव का विषय मान रहे हैं। एक वृद्ध निवासी बोले, सेठ ने कभी न ठुकराया, अब बारी उनका हिसाब चुकाने की है।
विवेक स्पष्ट करते हैं कि मकसद सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि इतिहास का इंसाफ है। लीगल टीम तैयार हो चुकी है। सवाल यही है कि क्या सदी भर बाद ब्रिटिश खजाना ढील बांधेगा।
















