तेल कंपनियों ने प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर और इंडस्ट्रियल डीजल में 22 रुपये तक की बढ़ोतरी कर दी है। यह बदलाव आज से लागू हो चुका है। कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गए हैं, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है।

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कीमतों में बड़ा उछाल
प्रमुख तेल कंपनियों ने स्पीड, पावर और XP95 जैसे प्रीमियम पेट्रोल ब्रांडों पर यह बढ़ोतरी की है। लखनऊ में अब प्रीमियम पेट्रोल 103.92 रुपये प्रति लीटर और पुणे में 113.77 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। इंडस्ट्रियल डीजल की कीमत 87.67 रुपये से बढ़कर 109.59 रुपये प्रति लीटर हो गई है। सामान्य पेट्रोल-डीजल की दरें अभी स्थिर हैं, लेकिन बाजार विशेषज्ञों को आशंका है कि जल्द ही इन पर भी असर दिखेगा।
उद्योगों पर सबसे ज्यादा मार
इंडस्ट्रियल डीजल का इस्तेमाल फैक्ट्रियों, जेनरेटरों और भारी मशीनरी में बड़े पैमाने पर होता है। इसकी बढ़ी कीमत से लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। मालभाड़ा दरें 5-10 प्रतिशत तक ऊपर जा सकती हैं, जिससे रोजमर्रा के सामान जैसे खाद्य पदार्थ, सब्जियां और अन्य जरूरी वस्तुओं के दाम बढ़ जाएंगे। एक औसत ट्रक चालक को रोजाना 500-1000 रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। निजी कार मालिकों पर असर कम है, लेकिन प्रीमियम फ्यूल यूजर्स को महीने में 100-200 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ेंगे।
मिडिल ईस्ट संकट का असर
यह बढ़ोतरी ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का नतीजा है। मिडिल ईस्ट में तेल आपूर्ति पर अनिश्चितता ने ब्रेंट क्रूड के दाम 105 डॉलर के पार धकेल दिए हैं। भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल जरूरत आयात पर पूरा करता है, इसलिए वैश्विक बाजार की उथल-पुथल यहां तेजी से महसूस होती है। पिछले एक हफ्ते में तेल कीमतें 15 प्रतिशत चढ़ चुकी हैं। अगर युद्ध जैसे हालात बने तो सामान्य ईंधन पर भी ब्रेक लग सकता है।
सरकार और उपभोक्ता क्या करें?
सरकार ने अभी कोई सब्सिडी या राहत पैकेज का ऐलान नहीं किया है। विपक्ष महंगाई रोकने के लिए केंद्र पर दबाव बना रहा है। उपभोक्ताओं के लिए सलाह है कि फ्यूल-एफिशिएंट वाहन चुनें, अनावश्यक यात्राओं से बचें या CNG, LPG जैसे वैकल्पिक ईंधन पर स्विच करें। इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर रुख करना लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकता है।
मुद्रास्फीति को झटका
यह बढ़ोतरी पहले से 6 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी मुद्रास्फीति को और भड़का सकती है। गरीब और मध्यम वर्ग पर दबाव बढ़ेगा, जबकि उद्योग उत्पादन लागत में इजाफे से जूझेंगे। तेल कंपनियां इसे बाजार की वास्तविकता बता रही हैं, लेकिन जनता वैकल्पिक ऊर्जा नीतियों और आयात कम करने की मांग कर रही है। कूटनीतिक प्रयासों से ही इस संकट से निजात मिलेगी। फिलहाल, ईंधन बिल भारी होने का समय है।
















